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रिमझिम तो है मगर सावन गायब है, बच्चे तो हैं मगर बचपन गायब है..!! क्या हो गयी है तासीर ज़माने की यारों अपने तो हैं मगर अपनापन गायब है !


वक़्त की हो धूप या तेज़ हो आँधियाँ, कुछ क़दमों के निशाँ कभी नहीं खोते, जिन्हें याद करके मुस्कुरा दें ये आँखें, वो लोग दूर होकर भी दूर नहीं होते..!!


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